लखनऊ । मुंह का एक छोटा-सा सफेद दाग, मामूली सा छाला या पान-गुटखे का हल्का निशान-अधिकांश लोग इन्हें सामान्य समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन यही लापरवाही आगे चलकर ओरल कैंसर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी का कारण बन सकती है। यह कहना है होप डेंटल हॉस्पिटल एवं वेलनेस सेंटर की निदेशक एवं अजंता हॉस्पिटल एवं आईवीएफ सेंटर की सीनियर कंसल्टेंट, दंत चिकित्सा विभाग की विभागाध्यक्ष, डॉ. हिमांगी दुबे का ।
विश्व कैंसर दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष बातचीत में उन्होंने बताया कि भारत में यह बीमारी तेजी से एक साइलेंट किलर के रूप में उभर रही है। उन्होंने कहा कि तंबाकू को आमतौर पर एक बुरी आदत या नशा माना जाता है, लेकिन चिकित्सा विज्ञान इससे कहीं अधिक गंभीर सच्चाई सामने रखता है। तंबाकू न केवल शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि यह कोशिकाओं के जीन तक को बदलने की क्षमता रखता है।

हर वर्ष विश्व में लगभग एक करोड़ लोगों की मृत्यु कैंसर से
इसका प्रभाव केवल तात्कालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और पीढ़ियों तक पड़ने वाला हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर वर्ष विश्व में लगभग एक करोड़ लोगों की मृत्यु कैंसर के कारण होती है, जिनमें बड़ी संख्या तंबाकू से जुड़े कैंसरों की है। वहीं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के आंकड़े बताते हैं कि भारत में पुरुषों में होने वाले कैंसरों में ओरल कैंसर शीर्ष कारणों में शामिल है।
तंबाकू का उपयोग खतरनाक
इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के हर तीन ओरल कैंसर मरीजों में से एक भारत से है, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। डॉ. हिमांगी दुबे ने बताया कि अक्सर यह माना जाता है कि सिगरेट सबसे ज्यादा नुकसानदायक है, लेकिन सच यह है कि गुटखा, खैनी और अन्य स्मोकलेस तंबाकू उससे भी अधिक घातक हैं।
दर्द न होना सबसे बड़ा खतरा
ओरल कैंसर की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसके शुरुआती लक्षणों में दर्द नहीं होता। मरीज महीनों तक इसे सामान्य छाला या दाग समझकर अनदेखा करता रहता है। परिणामस्वरूप 60–70 प्रतिशत मामले अंतिम स्टेज में सामने आते हैं, जब इलाज जटिल और सीमित हो जाता है। उन्होंने बताया कि हाल के शोध बताते हैं कि तंबाकू जीन के ऑन-ऑफ पैटर्न को बदल देता है (एपिजेनेटिक डैमेज)। यह तथ्य चिकित्सा विशेषज्ञों के लिए गहरी चिंता का विषय है।
इन लक्षणों को कभी न करें नज़रअंदाज़
दो हफ्ते से अधिक समय तक न भरने वाला छाला, मुंह में सफेद या लाल दाग, मुंह खोलने में कठिनाई, आवाज़ में बदलाव, बार-बार खून आना, गले या गर्दन में गांठ आदि लक्षणों को डॉ. हिमांगी दुबे ने नज़रअंदाज न करने की सलाह दी। वहीं उन्होंने बताया कि 14 दिन का नियम याद रखें—यदि दो सप्ताह में घाव ठीक न हो, तो तुरंत विशेषज्ञ से जांच कराएं।
ओरल कैंसर सबसे अधिक रोके जाने योग्य कैंसरों में से एक
डॉ. हिमांगी दुबे ने कहा कि ओरल कैंसर सबसे अधिक रोके जाने योग्य कैंसरों में से एक है। तंबाकू छोड़ने से इसका जोखिम 70-80 प्रतिशत तक कम हो जाता है और यदि बीमारी शुरुआती अवस्था में पकड़ में आ जाए, तो 90 प्रतिशत से अधिक मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। वहीं उन्होंने कहा कि विश्व कैंसर दिवस केवल जागरूकता का दिन नहीं, बल्कि संकल्प लेने का अवसर होना चाहिए। आज लिया गया एक सही निर्णय, कल कई जिंदगियां बचा सकता है।
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