लखनऊ : केजीएमयू के डॉक्टरों ने बिना आपरेशन मरीजों को यूं दिया जीवनदान, पैर की नस में कैथेटर डालकर बुजुर्गों को लगाए वॉल्व

केजीएमयू लारी कॉर्डियोलॉजी विभाग के डॉक्टरों ने दिल के वॉल्व की गंभीर बीमारी से पीडि़त दो बुजुर्ग को नया जीवन देने में कामयाबी हासिल की है। विभाग के डॉ. शरद चन्द्रा, डॉ. गौरव चौधरी और डॉक्टर अखिल शर्मा ने बिना बाईपास सर्जरी वॉल्व बदलने में सफलता हासिल की है। ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वॉल्व इम्प्लांटेशन (टीएवीआई) प्रक्रिया को अपनाकर बुजुर्गों को बड़े ऑपरेशन के दर्द से बचाया है।

लखनऊ । देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में शुमार राजधानी स्थित किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी-केजीएमयू में डॉक्टरों ने दिल की समस्या से पीडि़त दो बुजुर्गों की जान बिना बड़े आपरेशन के बचाई । पैर की कैथेटर डालकर वॉल्व प्रत्यारोपित किया गया। बताया गया कि बुजुर्ग अन्य कई बीमारियों से पीडि़त थे। इसलिए बाईपास सर्जरी में खतरा ज्यादा था । वहीं इस सराहनीय कार्य पर डॉक्टरों की टीम को कुलपति ने बधाई दी है ।

दो बुजुर्ग को नया जीवन देने में मिली कामयाबी

जानकारी के मुताबिक केजीएमयू लारी कॉर्डियोलॉजी विभाग के डॉक्टरों ने दिल के वॉल्व की गंभीर बीमारी से पीडि़त दो बुजुर्ग को नया जीवन देने में कामयाबी हासिल की है। विभाग के डॉ. शरद चन्द्रा, डॉ. गौरव चौधरी और डॉक्टर अखिल शर्मा ने बिना बाईपास सर्जरी वॉल्व बदलने में सफलता हासिल की है। ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वॉल्व इम्प्लांटेशन (टीएवीआई) प्रक्रिया को अपनाकर बुजुर्गों को बड़े ऑपरेशन के दर्द से बचाया है।

वॉल्व में थी खराबी

सोमवार को लारी कॉर्डियोलॉजी विभाग के डॉक्टरों ने पत्रकारों से बुजुर्गों के इलाज की जानकारी साझा की। पहले बुजुर्ग की उम्र करीब 84 वर्ष है। उनके वॉल्व में खराबी थी। दिल कम पंप कर पा रहे थे। बुजुर्ग को डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, पेशाब में खून आने और दोनों फेफड़ों में पानी भरने की समस्या भी थी। डॉ. शरद चन्द्रा ने बताया कि ऐसी दशा में बाईपास सर्जरी कर वॉल्व बदलना मुमकिन नहीं था।

बॉल्व किया गया प्रत्यारोपित

एंजियोग्राफी व दुसरी जांच में पता चला की धमनियों में काफी मात्रा में कैल्शियम जमा था। जिससे धमनी संकरी हो चुकी थी। ऐसी दशा में इंट्रावस्कुलर लीथोट्रिप्सी बैलून प्रक्रिया का उपयोग करके कैल्शियम तोड़कर धमनियों को चौड़ा किया गया। इसके बाद पैर की नस में कैथेटर डालकर वॉल्व तक पहुंचाया गया। फिर बॉल्व प्रत्यारोपित किया गया। डॉ. गौरव चौधरी ने बताया कि दूसरे मरीज की उम्र 75 वर्ष है।

वॉल्व बदलने में कामयाबी मिली

मरीज को आठ साल पहले सर्जरी कर दिल का वाल्व बदला गया था। सर्जरी के बाद में खराबी शुरू हुई। करीब आठ साल में वॉल्व पूरी तरह से फेल हो गया। उम्र व दूसरी बीमारियों के चलते बाईपास सर्जरी कठिन थी। मरीज की जिंदगी बचाने के लिए वॉल्व बदलना जरूरी था। उन्होंने बताया कि टीएबीआई तकनीक से मरीज का वॉल्व बदलने में कामयाबी मिली।

48 घंटे बाद ही मरीज डिस्चार्ज

बताया गया कि वॉल्व प्रत्यारोपण के बाद मरीज पूरी तरह से ठीक है। 48 घंटे बाद ही मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। वहीं डॉ. अखिल शर्मा ने बताया कि उम्र अधिक होने व दूसरी बीमारियों के कारण बाईपास सर्जरी कठिन होती है। ऐसे में सिकुड़ चुके वॉल्व को बदलना चुनौती से कम नहीं था। टीएवीआई तकनीक गंभीर बीमारियों से जूझ रहे वॉल्व के मरीजों के लिए रोशनी से कम नहीं है।

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