प्रणय रॉय का सच्चा प्यार …

Prannoy Roy's True Love...

पत्रकार में दम हो तो वो पत्रकारिता के साथ खुद का मीडिया हाउस खड़ा करने का दम रखता है।

अपनी मोहब्बत को वो चांद पर घुमा लाया। वक्त हालात बदले, अब वो प्यार के उसी जज्बे से अपनी मोहब्बत को ठेले पर गोलगप्पे खिलाने ले जाता है। चांद और ठेले तक ले जाने का सुख बराबर है। क्योंकि प्यार का जज्बा चांद और ठेले में फर्क नहीं समझता। आप अट्ठारह के हों या अस्सी के,प्यार से कभी जी नहीं भरता। पत्रकारिता या किसी भी काम को जब आप अपनी महबूबा बना लेते हैं तो ये मोहब्बत मरते दम तक जारी रहती है। इससे जी कभी नहीं भरता।

Prannoy Roy का पत्रकारिता से प्यार का जज्बा देखिए।‌ लगभग पांच दशक पहले दूरदर्शन के एक न्यूज रीडर से सफर शुरू करने वाले प्रणय ने अपनी पत्नी राधिका के साथ भारत को सर्वश्रेष्ठ निष्पक्ष न्यूज चैनल एनडी टीवी दे दिया था। इन्हें निजी सैटेलाइट न्यूज चैनल का जनक कहा जाता है। सेटेलाइट न्यूज चैनलों की शुरुआत में इक्का-दुक्का ही न्यूज चैनल थे। नब्बे के दशक में बड़े से बड़े कॉरपोरेट हाउस न्यूज चैनल शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। उस समय प्रणय और राधिका ने एक बेहतरीन न्यूज चैनल स्थापित कर साबित किया था कि पत्रकार में दम हो तो वो पत्रकारिता के साथ खुद का मीडिया हाउस खड़ा करने का दम रखता है।

करीब साढ़े तीन दशक तक एनडीटीवी चलाने वाले प्रणय रॉय का समय बदला और चैनल हाथ से निकल गया। कहां जाता है एनडीटीवी सरकार का भोपू बनने को तैयार नहीं था इसलिए कंपनी के आर्थिक हालात बिगड़ते गए और गौतम अडानी ने एनडीटीवी खरीद लिया। इसके बाद प्रणय-राधिका के पास बड़ी जमा-पूंजी भी नहीं थी। लेकिन इस युगल के पास पत्रकारिता से लगाव, मोहब्बत और इमोशनल रिश्ते की पूंजी बची थी। पत्रकारिता के हिमालय पर्वत की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंचने के बाद भी इस बूढ़े पत्रकार दम्पति का निष्पक्ष सच्ची पत्रकारिता के प्रेम से दिल नहीं भरा। अब वो एक बार फिर जीरो से शुरुआत कर रहे हैं। बिना संसाधन या किसी यूनिट के करीब अस्सी की उम्र में निकल पड़े हैं ग्राउंड रिपोर्टिंग करने। एक हाथ में मोबाइल से रिकार्ड कर रहे हैं और दूसरे हाथ में माइक लिए हैं। उन्होंने अबकि बार डिकोडर नाम से छोटे से यूट्यूब चैनल की शुरुआत की है। इस बार की पारी में इनके चेहरे पर बुढ़ापा आ गया है। शरीर कमजोर पड़ गया है, लेकिन जोश और जज्बा पहले जैसा ही है। बिल्कुल जवान आंशिक जैसा।

                                                                                                                                                                                                                                              — नवेद शिकोह

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