लखनऊ। Seat Sharing लगातार दो विधानसभा चुनाव में हार झेल चुकी सपा इस बार जीत के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती है। लेकिन उसके सपनों को पूरा करने की राह में एक नहीं कई बाधाएं सामने आने लगी है। अब तक के घटनाक्रम पर नजर डाले तो सबसे बड़ी बाधा उसकी सहयोगी कांग्रेस बनकर उभर रही है। दरअसल सपा उसे 45 से 50 सीट ही देना चाहती है, वहीं कांग्रेस के रणनीतिकार 150 सीटों पर चुनाव लड़ने का मनसूबा बना चुके है। इसके अलावा ओवैसी और चंद्रशेखर की पार्टी लगातार अपनी ताकत बढ़ाकर चुनाव को और रोचक बनाती नजर आ रही है। बता दें कि कांग्रेस ने चुनाव लड़ने के लिए ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम प्रभाव वाली 150 सीटें चिन्हित की हैं। अब सबसे बड़ा सवाल सीट बंटवारे को लेकर खड़ा हो गया है।
मुस्लिम मतदाताओं पर नजर
विधानसभा चुनाव में खुद अधिक मजबूत साबित करने के लिए कांग्रेस ने इमरान मसूद को सक्रिय करके मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की कोशिश में है। वहीं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बरेली दंगे के आरोपित के घर जाकर यह तक कह दिए कि बरेली में कोई दंगा हुआ ही नहीं। वहीं सपा की तरफ से इकरा हसन मोर्चा संभाली है। सपा के प्रमुख मुस्लिम चेहरा आजम खान के जेल में होने से सपा को नुकसान हो सकता है। वहीं प्रदेश में मुस्लिम को रिझाने के लिए ओवैसी लगातार घेराबंदी कर साथ ही प्रमुख दलों को यह एहसास दिलाने में लगे है कि बिना उसके किसी का भला नहीं हो सकता।
जल्द हो सकता है फैसला
विधान सभा चुनाव में कौन सी पार्टी किस सीट पर उतरेगी, इसके लेकर अगले सप्ताह बैठक में फैसला हो सकता है। प्रदेश की 403 सीटों को कांग्रेस ने तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। इनमें से 150 ऐसी सीटें चुनी हैं जो सपा के वोट बैंक को मिला दें तो पार्टी के अनुकूल हो जाती है। इनमें से ज्यादातर मुस्लिम, ब्राह्मण व दलित प्रभाव वाली सीटें हैं। सूत्रों ने कहा कि प्रारंभिक बातचीत में सपा से 150 सीटें मांगी जाएगी। हालांकि अंतिम लाइन सौ सीटों की है। इससे नीचे का प्रस्ताव पार्टी मंजूर नहीं करेगी।पार्टी के वरिष्ठ नेता ने गठबंधन के संदर्भ में कहा कि सपा को कांग्रेस की ताकत का अंदाजा है। सपा जब 2019 के चुनाव में बसपा के साथ लड़ी थी तब उसे महज पांच सीटें मिली थी। जब हमारे साथ 2024 में लड़ी तो सपा को 37 सीटें मिली।
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