Engineers’ Day: भारत में प्रत्येक वर्ष 15 सितंबर को इंजीनियर्स डे मनाया जाता है। यह दिवस सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। उनका जीवन केवल तकनीकी उत्कृष्टता का प्रतीक नहीं है। यह दर्शाता है कि इंजीनियरिंग ज्ञान, जनहित के प्रति जिम्मेदारी और प्रशासनिक दूरदृष्टि मिलकर किस प्रकार राष्ट्र का रूपांतरण कर सकते हैं।विश्वेश्वरैया समझते थे कि बांध, सिंचाई प्रणाली या औद्योगिक परियोजना केवल कोई संरचना नहीं होती, बल्कि आर्थिक प्रगति, सामाजिक कल्याण और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता का साधन होती है। उनका उदाहरण आज भी प्रासंगिक है, जब भारत ऊर्जा संक्रमण, जल सुरक्षा, डिजिटल बुनियादी ढांचे, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी विकास जैसी जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है।आज हमारे सामने प्रश्न यह नहीं है कि इंजीनियरों ने राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया है या नहीं। उनका योगदान निर्विवाद है। प्रश्न यह है कि जिन संस्थानों में वे कार्य करते हैं, क्या वे उन्हें अपनी पूरी क्षमता से योगदान देने के लिए आवश्यक अधिकार, सम्मान और पेशेवर स्वतंत्रता प्रदान कर रहे हैं?
जिम्मेदारी और अधिकार के बीच बढ़ता अंतर
भारत के इंजीनियरों ने विद्युत प्रणालियों, बांधों, राजमार्गों, रेलवे, उद्योगों, संचार नेटवर्क और महत्वपूर्ण सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण एवं रखरखाव किया है। वे कठिन परिस्थितियों में कार्य करते हैं, आपात स्थितियों का सामना करते हैं और असाधारण दबाव के बीच भी आवश्यक सेवाओं को जारी रखते हैं।फिर भी, अनेक तकनीकी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में इंजीनियरों को ऐसे परिणामों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है, जिनसे जुड़े निर्णयों को आकार देने में उनकी समान भूमिका नहीं होती। कई बार तकनीकी सलाह को सामान्य प्रशासनिक अधिकार के अधीन मान लिया जाता है, जबकि संबंधित विषय विशेष तकनीकी ज्ञान की मांग करता है।यह असंतुलन केवल इंजीनियरों को प्रभावित नहीं करता, बल्कि शासन की गुणवत्ता पर भी असर डालता है। पर्याप्त मैदानी परामर्श के बिना बनाई गई नीतियां अनावश्यक देरी, संसाधनों के अप्रभावी उपयोग, कमजोर क्रियान्वयन और संस्थागत विश्वास में कमी का कारण बन सकती हैं।अच्छा प्रशासन आवश्यक है। लेकिन जब प्रशासन पेशेवर विशेषज्ञता से निर्देशित होता है, तो वह कमजोर नहीं, बल्कि और अधिक सक्षम बनता है।
तकनीकी नेतृत्व की परंपरा को पुनर्स्थापित करना
भारत का प्रशासनिक इतिहास हमें महत्वपूर्ण सबक देता है। लोक निर्माण विभाग में मुख्य अभियंता कभी पर्याप्त तकनीकी और प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग करते थे। उत्तर प्रदेश में 1970 के दशक के दौरान इंजीनियरों को पावर सेक्रेटरी और सिंचाई सचिव जैसे दायित्व सौंपे गए थे। इन अनुभवों ने सिद्ध किया कि पेशेवर दक्षता और प्रशासनिक नेतृत्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।ऐसा कोई ठोस कारण नहीं है कि तकनीकी विभागों में वरिष्ठ पदों का निर्धारण मुख्यतः सेवा-संवर्ग की पहचान के आधार पर हो, न कि योग्यता, अनुभव, दक्षता और उपयुक्तता के आधार पर।इसलिए प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से इंजीनियरों के लिए नीति-निर्माण, विभागीय नेतृत्व और रणनीतिक योजना में अधिक अवसर खोले जाने चाहिए। सचिवालय स्तर पर तकनीकी सेवाओं की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए, जबकि नियमित कार्यकारी जिम्मेदारियों का विकेंद्रीकरण करके दक्षता और जवाबदेही बढ़ाई जानी चाहिए।
गरिमा ही बेहतर कार्य-प्रदर्शन की नींव है
जिस व्यवस्था में तकनीकी सलाह की लगातार उपेक्षा हो, पदोन्नति में योग्यता को पर्याप्त महत्व न मिले और जिम्मेदारी को अधिकार से अलग कर दिया जाए, वहां पेशेवर गौरव लंबे समय तक कायम नहीं रह सकता। निष्पक्ष कैरियर प्रगति, समानतापूर्ण वेतन, पारदर्शी चयन और अनावश्यक हस्तक्षेप से संरक्षण आवश्यक हैं—ये विशेषाधिकार नहीं, बल्कि प्रभावी सार्वजनिक सेवा की बुनियादी शर्तें हैं।जिस तकनीकी अधिकारी को नेतृत्व के लिए विश्वास और अधिकार दिया जाता है, वह नवाचार करने, जिम्मेदारी स्वीकार करने और बेहतर परिणाम देने के लिए अधिक प्रेरित होता है। जो व्यवस्था पेशेवर ज्ञान का अवमूल्यन करती है, वह अंततः अपनी ही क्षमता को कमजोर करती है।
विश्वेश्वरैया के योग्य – एक संकल्प
इंजीनियर्स डे केवल भाषणों और औपचारिक श्रद्धांजलियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह सरकारों और संस्थानों को इस बात की समीक्षा करने के लिए प्रेरित करे कि क्या इंजीनियरों को उन क्षेत्रों का नेतृत्व करने के वास्तविक अवसर मिल रहे हैं, जिन्हें वे भली-भांति समझते हैं।भारत का भविष्य ऊर्जा, जल, बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जलवायु सहनशीलता से जुड़े तकनीकी रूप से सुदृढ़ निर्णयों पर निर्भर करेगा। इंजीनियरों को योजना, नीति-निर्माण और मूल्यांकन में भागीदार बनाया जाना चाहिए—केवल दूसरों द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू करने वाला नहीं।सर एम. विश्वेश्वरैया को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि इंजीनियरों की पेशेवर गरिमा बहाल की जाए, तकनीकी नेतृत्व को मजबूत किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि शासन के केंद्र में योग्यता का स्थान बना रहे। जो राष्ट्र तकनीकी आत्मनिर्भरता प्राप्त करना चाहता है, उसे सबसे पहले अपने इंजीनियरों पर विश्वास करना और उन्हें सशक्त बनाना सीखना होगा।

— इंजीनियर शैलेन्द्र दुबे
अध्यक्ष, ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF)
