“मानवाधिकारों पर बढ़ते हमले और हमारी जिम्मेदारी” विषय पर परिचर्चा आयोजित

CPDRS की ओर से आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए डी. एन. रथ

2 मार्च 2025, पटना । नागरिक-जनवादी अधिकारों और धर्मनिरपेक्षता पर हो रहे हमले के खिलाफ आज सेंटर फॉर प्रोटक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स एंड सेक्युलरिज्म (सीपीडीआरएस) की ओर से स्थानीय आईएमए हॉल में “मानवाधिकारों पर बढ़ते हमले और हमारी जिम्मेदारी” विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी।

परिचर्चा का उद्घाटन करते हुए बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष और पटना हाई कोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि हमें अपने अधिकारों—चाहे वे नागरिक अधिकार हों या फिर जनवादी अधिकार—के प्रति जागरूक होना होगा और उनकी हिफाजत के लिए आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि हमें अपने अन्दर सकारात्मक सोच विकसित करते हुए खुद के अन्दर भी बदलाव लाने की जरूरत है ताकि हम एक इन्सान के रूप में समाज में अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकें।

परिचर्चा को संबोधित करते हुए सेवानिवृत आईएएस एवं बिहार राज्य आपदा प्रबंधन ऑथोरिटी के भूतपूर्व उपाध्यक्ष व्यास जी ने कहा कि शासन-प्रशासन में बैठे लोग ही  मानवाधिकारों का सबसे ज्यादा उल्लंघन कर रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी द्वारा एक खास समुदाय के लोगों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है। जीने के अधिकार, स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है।

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद ने कहा कि कार्यपालिका, विधायिका और यहां तक कि न्यायपालिका के स्तर से भी मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहे हैं।

अपने संबोधन में (सीपीडीआरएस) के संयोजक द्वारिका नाथ रथ ने कहा कि देश के नागरिकों को निगरानी में रखा गया है कि कौन क्या बोल रहा है। लोगों में डर काम करने लगा है कि हमारे बोलने का क्या नतीजा होगा। इस प्रकार अभिव्यक्ति की आजादी खत्म हो रही है। उन्होंने नागरिक और जनवादी अधिकारी की रक्षा के सरह-साथ धर्मनिरपेक्षता की हिफाजत के लिए भी संघर्ष पर बल दिया।

परिचर्चा को पटना हाई कोर्ट के अधिवक्ता गोपाल कृष्ण और रश्मि झा ने भी संबोधित किया। अध्यक्षता पटना हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद फिरोज रजा ने किया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की प्रमुख ताकत तभी बन सकता है, जब देश की जनता अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो और यह काम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का है।

सभी वक्ताओं ने इस बात को दुहराया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, देश की स्वतंत्रता और संगठित होने की स्वतंत्रता खतरे में है। नागरिकों की आवाज को दबाने की हर संभव कोशिश की जा रही है। अंत में नागरिकों को जागरूक करने और नागरिक व जनवादी अधिकारों के उल्लंघन अथवा हनन होने पर सरकारों एवं शासन-प्रशासन के समक्ष अपनी बात और सुझाव पेश करने के लिए 18-सूत्री मांगों से सम्बंधित एक प्रस्ताव पटना हाई कोर्ट के अधिवक्ता निकोलाई शर्मा ने पेश किया, जिसे सर्वसम्मति से पारित किया गया। परिचर्चा का विषय प्रवेश अर्चना अपराजिता ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन स्वतंत्र पत्रकार पुष्पराज ने किया।

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