bazar में आग और जख्मों पर नमक!

Adding insult to injury in the market!

bazar में आग लगी हुई है — महंगाई की आग। एक सप्ताह के अंदर ही प्याज के भाव दुगुने हो गए हैं — 25 रूपये से 50 रूपये प्रति किलो। एक महीने के अंदर ही शक्कर 48 रूपये से 70 रूपये प्रति किलो पर पहुंच गई है, याने 46 प्रतिशत का इजाफा। गुड़ भी 50 रूपये किलों से बढ़कर 65 रूपये पार करके 30 प्रतिशत महंगी हो गई है। चावल और मक्के का आटा भी क्रमशः 16 और 11 प्रतिशत महंगा हो गया है। पशु आहार की कीमतों में भी 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई है। पेट्रोल की कीमतें भी अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ा दी गई है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में कमी होने और पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल की मिलावट करने के बावजूद इसकी कीमतों में कोई कमी नहीं की गई है। इससे गाड़ियों का माइलेज कम हो गया है और परिवहन की लागत में भारी इजाफा हो गया है। ये सब चीजें आम जनता की रोजमर्रा की जरूरत है। और यह सब त्योहारी सीजन में हो रहा है।
हर त्योहारी सीजन महंगाई लेकर आता है। लेकिन आज जो महंगाई है, क्या उसके पीछे केवल यही एक कारण है? शायद मोदी सरकार यही समझ रही है और इसलिए उसने शक्कर कारोबारियों के लिए स्टॉक रखने की सीमा लागू की है। कल यही कदम प्याज और दूसरे खाद्यान्नों के बारे में भी उठाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेगी। महंगाई अपनी रफ्तार से बढ़ती रहेगी, क्योंकि यह केवल जमाखोरी और कालाबाजारी से पैदा हुई महंगाई नहीं है, सरकार की कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों से उपजी है और इन नीतियों की समीक्षा करने के लिए सरकार तैयार नहीं है। शुरूआत पेट्रोल से ही करें, जो अप्रत्यक्ष रूप से महंगी हो गई है। पेट्रोल की महंगाई हर चीज की कीमतों को बढ़ाती है और एक चीज की कीमत बढ़ने पर दूसरी चीज अपने आप महंगी हो जाती है और यह चक्र चलते रहता है। सरकार की इथेनॉल नीति भी इस महंगाई के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि इसे बनाने के लिए गन्ना और मक्का जैसे खाद्यान्नों का प्रयोग होता है। जिस देश में आधी आबादी भुखमरी और कुपोषण से ग्रस्त हो, वहां खाद्यान्नों से इथेनॉल बनाना कहां तक जायज है? पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर विदेशी मुद्रा बचाने का तर्क पूरी तरह से बचकाना है, क्योंकि जितना ज्यादा एथेनॉल बनेगा, हमारे देश में खाद्यान्न संकट पैदा होगा। खाद्यान्न की कमी की भरपाई आयात से ही संभव है और इस आयात के लिए शुद्ध विदेशी मुद्रा ही खर्च करना पड़ेगा, जो कच्चे तेल के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा से ज्यादा ही बैठेगा।

आपूर्ति के सिद्धांत पर काम नहीं करता

दूसरा कारण, मोदी सरकार की मेहरबानी से खाद्यान्न बाजार अब मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर काम नहीं करता, बल्कि अब यह पूरी तरह से सट्टा बाजार में बदल गया है। इस समय, बाजार में शक्कर की कमी नहीं है, इसके बावजूद इसकी कीमत बढ़ रही है, तो इसलिए कि अनाज के सटोरियों को मालूम है कि मोदी सरकार की एथेनॉल नीति के कारण निकट भविष्य में शक्कर की भयंकर किल्लत होने वाली है। इस सटीक अनुमान के साथ जमाखोर और कालाबाजारियों ने कृत्रिम संकट पैदा करना शुरू कर दिया है, जिससे वास्तविक किल्लत के समय वह और ज्यादा मुनाफा बटोर सके।तीसरा कारण, उपभोक्ताओं को खुले बाजार में धकेलने की मोदी सरकार की नीति है। खाद्यान्न सुरक्षा कानून के तहत अभी तक हर महीने प्रति परिवार 35 किलो अनाज मिलता था। अब इसे घटाकर 7 किलो प्रति व्यक्ति और अधिकतम 35 किलो प्रति परिवार किया जा रहा है, जबकि एक व्यक्ति के लिए न्यूनतम 15 किलो पोषण आहार की जरूरत होती है।
सटोरियों को मालूम है कि खाद्यान्न सुरक्षा कानून को कमजोर करने का अर्थ है, लगभग 25 करोड़ परिवारों का खुले अनाज बाजार में निर्भरता का बढ़ना। इससे बाजार में मांग बढ़ेगी और लोगों को निचोड़ने के रास्ते खुलेंगे। आज की यह महंगाई सरकार की इन्हीं मिली-जुली नीतियों का नतीजा है। 12 साल पहले भाजपा ने महंगाई कम करने और किसानों की आय दुगुनी करने का वादा किया था। लेकिन हुआ इसका उल्टा। आम जनता की वास्तविक आय में भारी गिरावट आई है और 2014 की तुलना में महंगाई में भारी बढ़ोतरी हुई है। मंहगाई में यह भारी बढ़ोतरी चाय के उदाहरण से समझ लीजिए। केवल शक्कर की ही कीमत नहीं बढ़ी है, चायपत्ती की कीमत भी 150 रूपये से बढ़कर 400 रूपये किलो तक पहुंच गई है। चाय में स्वाद बढ़ाने और सेहत बनाने वाली अदरक की कीमत भी 50 रूपये से उछलकर 320 रूपये किलो पर पहुंच गई है और इलाइची की कीमत 900 रूपये से 4800 रूपये किलो पर। दूध भी सस्ता नहीं, 80 रूपये प्रति लीटर बिक रहा है। स्वाभाविक है कि गरीबों को जो चाय ठेलों पर 5 रूपये में मिलती थी, उसकी कीमत अब बाजार में 20 रूपये प्रति कप तक पहुंच गई है। मेहनतकशों के लिए अब चाय पीना भी दूभर हो गया है।

जख्मों पर ही नमक छिड़क रही

लेकिन इसके बावजूद भाजपा आम जनता को दिए अपने जख्मों पर ही नमक छिड़क रही है। मध्यप्रदेश के स्वनामधन्य संसदीय कार्यमंत्री कैलाश विजयवर्गीय का बयान देखिए : “90 फीसद लोग मीठा खाना पसंद नहीं करते हैं। मैं भी नहीं खाता हूं। मैं तो कहता हूं शक्कर खूब महंगी हो जाएं।” गोदी मीडिया ने उनके इस बयान को उनकी हंसी-ठिठोली या चुटकी के रूप में पेश किया है।लेकिन यह बयान ठीक वैसा ही है, जैसे प्याज की बढ़ती कीमतों पर एक बार केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने बयान दिया था कि वे तो प्याज ही नहीं खाती। उनके इस बयान की पूरे देश में आलोचना हुई थी। सवाल यही है कि यदि कोई मंत्री प्याज या मीठा नहीं खाता, तो क्या पूरे खाना छोड़ देना चाहिए? देश में लोगों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए, इसे तय करने का अधिकार संघी गिरोह को किसने दिया है? विजयवर्गीय के इस बयान की भी आलोचना हो रही है। आलोचना सुनने के बजाय संघी गिरोह का प्रति प्रश्न है : क्या किसी मंत्री को हंसी-ठिठोली करने का अधिकार नहीं है? तो हम केवल यही पूछना चाहेंगे कि आम जनता की भीषण समस्या पर भी किसी मंत्री को ऐसा अधिकार है? वैसे भी, कैलाश विजयवर्गीय को एक बदतमीज मंत्री के रूप में जाना जाता है। पिछले दिनों इंदौर में प्रदूषित पेयजल से हुई मौतों के बारे में भी उन्होंने ऐसी ही संवेदनहीन बातें कही थी और एक पत्रकार द्वारा प्रश्न पूछे जाने पर उनके साथ गाली-गलौज की थी।

कीमतों को नियंत्रित करना

जनता महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रही है, त्योहारी सीजन में शक्कर की कीमतें उसे रुला रही है, तब कीमतों को नियंत्रित करने के बजाय उस समस्या को हंसी-ठिठोली में दफना देना कौन सी राजनीति है? निश्चित ही, कैलाश विजयवर्गीय का यह बयान जनता की भावनाओं को आहत करने वाला भी है और उनके जख्मों पर नमक छिड़कने वाला भी। उनके इस बयान से यह भी साफ हो गया है कि भाजपा सरकार जनता की नहीं, बल्कि कालाबाजारियों और सटोरियों की सगी है। मंत्री को यह मालूम होना चाहिए कि लोग मीठा खाना पसंद करें या न करें, शक्कर आम जनता की दैनिक अति-आवश्यक वस्तु है, जिसकी कीमतों पर लगाम लगाना किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी बनती है। लेकिन यदि खाद्यान्न के बाजार को सट्टा बाजार में ही बदल दिया जाएगा, तो फिर यह संभव नहीं है। भाजपा के 12 सालों के मोदी राज में ठीक यही काम हुआ है। अपनी ही नीतियों की शिकार जनता की अब भाजपाई नेता खिल्ली उड़ाने में लगे हैं।
संसदीय कार्य मंत्री होने के नाते कैलाश विजयवर्गीय सरकार के प्रवक्ता भी हैं। इस नाते इसे व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं, बल्कि भाजपा की डॉ. मोहन यादव सरकार का आधिकारिक बयान समझा जाना चाहिए। वैसे भी मुख्यमंत्री या भाजपा के किसी नेता ने कैलाश विजयवर्गीय के बयान का अभी तक खंडन भी नहीं किया है। हमेशा धर्म और बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं की आड़ में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाली भाजपा का असली चेहरा इस बयान से बेनकाब हो गया है। लेकिन जिस सरकार की करनी ही महंगाई बढ़ाने वाली हो, उसे सत्ता में एक मिनट भी बने रहने का अधिकार दिया जाना चाहिए?
*(आलेख : संजय पराते)*
*(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*

One thought on “bazar में आग और जख्मों पर नमक!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अंतरा बनर्जी की तस्वीर से मचा हड़कंप Rumors of Palak Tiwari and Ibrahim dating. Community unites against child labour, holds awareness rally. ‘राम’ बनकर छाए रणबीर कपूर Play Holi with herbal colours