गाजियाबाद। Euthanasia granted for the first time in the country 13 साल से सिर्फ सांसे ले रहे हरीश की सांसे भी अब थम जाएगी। बेटे के ठीक होने के सारे रास्ते बंद होने के बाद भी एक माता—पिता लगातार 13 साल से बेटे की देखभाल कर रहा है। उनके बाद बेटे का क्या होगा इसी चिंता में कोर्ट से बेटे की इच्छामृत्यु मांगी जिसे कोर्ट ने विस्तृत अध्ययन के बाद स्वीकार कर लिया। अब हरीश को वैज्ञानिक तरीके से मृत्यु दी जाएगी। इसके उनके उन अंगों को दान कर दिया जाएगा जो अभी तक सही सलामत काम कर रहे है। पढ़िएं क्या हुआ था,13 साल पहले जो एक माता—पिता को अपने कलेजे के टुकड़े के लिए इच्छामृत्यु मांगनी पड़ी…
चौथी मंजिल से गिरे थे हरीश
कोर्ट के बाहर पिता अशोक राणा ने बताया कि 2013 में रक्षाबंधन के दिन हरीश पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। जिससे उनके सिर और कमर में गंभीर चोट आई थी। उस समय परिवार को उम्मीद थी कि इलाज के बाद वह ठीक हो जाएंगे, लेकिन हादसे के बाद से वह बिस्तर से उठ नहीं पाए।घर वाले 13 साल से हरीश के इलाज और देखभाल में लगे हुए हैं। उनका इलाज विभिन्न अस्पतालों में कराया, लेकिन कोई खास सुधार नहीं हो सका।बेटै के इलाज में परिवार ने 2021 में दिल्ली के महावीर एंक्लेव स्थित अपना तीन मंजिला मकान भी बेच दिया। अब परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हो चुकी है और आगे इलाज कराना उनके लिए संभव नहीं रह गया है। ऐसे में वे बेटे को इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने और उसके अंगों के माध्यम से दूसरों को जीवन देने की इच्छा रखते हैं।
एक गंभीर तंत्रिका संबंधी विकार
क्वाड्रिप्लेजिया, जिसे टेट्राप्लेजिया के नाम से भी जाना जाता है, एक अत्यंत गंभीर तंत्रिका संबंधी स्थिति है। इसमें व्यक्ति के शरीर के चार प्रमुख अंग – दोनों हाथ और दोनों पैर – लकवाग्रस्त हो जाते हैं, जिससे उनकी गतिशीलता और कार्यक्षमता पर गहरा असर पड़ता है। यह स्थिति मुख्य रूप से रीढ़ की हड्डी में, विशेषकर गर्दन के क्षेत्र में, गंभीर चोट लगने या किसी बीमारी के कारण उत्पन्न होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक असाधारण फैसला सुनाते हुए 13 साल से कोमा में रह रहे हरीश राणा को पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी है। यह निर्णय भारत में ‘मानव गरिमा के साथ मरने के अधिकार’ की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कोर्ट ने यह फैसला 2018 के ‘कॉमन कॉज’ मामले में दिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय और 2023 में जारी किए गए संशोधित दिशानिर्देशों के आधार पर सुनाया है।
मेरे बाद बेटे का क्या होगा
हरीश के माता-पिता बुढे हो रहे है, इसलिए उन्हें यह डर सता रहा है कि वे हमेशा अपने बेटे के साथ नहीं रह पाएंगे। ऐसे में उनके बाद बेटे का क्या होगा। बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की मांग करना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन हर दिन उसे इस हालत में देखना भी उनके लिए बेहद पीड़ादायक है। माता-पिता चाहते हैं कि इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के बाद हरीश के शरीर के जो अंग काम कर रहे हैं, उन्हें दान कर दिया जाए ताकि दूसरों को नया जीवन मिल सके। यह मार्मिक बातें हरीश के पिता अशोक राणा ने सुप्रीम कोर्ट से बेटे की इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के बाद कहीं।
राजनगर एक्सटेंशन स्थित राज अंपायर में रहने वाले 31 वर्षीय हरीश राणा 13 साल से बिस्तर पर हैं। उनकी सांसें तो चल रही हैं, लेकिन शरीर पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है। वह क्वाड्रिप्लेजिया बीमारी से पीड़ित हैं और 100 प्रतिशत दिव्यांग हो चुके हैं। हरीश की मां निर्मला देवी ने बेटे की इच्छा मृत्यु की अनुमति के लिए पहले हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन 8 जुलाई को अदालत ने उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
mosquitoes ;मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती खरीदते समय इन 5 बातों का रखें ध्यान
