लघु कथा : भरोसे का मान, कथाकार : डॉ. नीरज कनौजिया

कथाकार : डा. नीरज कनौजिया

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जीवन अनुभवों से संवारा जा सकता है, जो भले ही दूसरों की आप बीती हो पर यदि कोई उनसे कुछ सीखना चाहे तो वे बहुत सारे सबक दे जाते हैं। किसी पर आसानी से भरोसा किया जाए अब वह जमाना नहीं रहा लेकिन कन्हैया ने स्पष्ट कर दियाहै कि आज भी किसी के भरोसे का मान रखा जा सकता है,
बात उन दिनों की है जब मैं शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल में प्राचार्य के पद पर कार्यरत थी, मुझे बचपन से ही शिक्षा के प्रति विशेष लगाव है। इसलिए मेरी कोशिश यह रहती थी कि कोई भी छात्र किसी अभाव के कारण पढ़ाई ना छोड़े। मेरे कार्यकाल में कोई भी छात्र फीस के अभाव में परीक्षा से वंचित नहीं रहा। मेरे स्टाफ का भी इस कार्य में मुझे बहुत सहयोग मिला। मैं जब क्लास लेती थी या विद्यालय के राउण्ड पर जाती तो छात्रों से कह देती थी कि किसी छात्र को पढ़ाई या फीस देने में कोई परेशानी हो तो वह मुझ से आकर मिल लें। यही बात मैंने अपने बोर्ड प्रभारी शिक्षक से भी कह रखी थी कि कोई गरीब छात्र फीस ना देने की कारण परीक्षा से वंचित नहीं रहना चाहिए, उसकी फीस में भर दूंंगी।
अनेक छात्रों की फीस मैंने एवं मेरे स्टाफ के सदस्यों ने कई बार भरी है। जब यह बात मेरे विद्यालय के चपरासी कन्हैया के कान में पड़ी तो वह तुरंत मेरी कक्ष में आया और कहने लगा कि “मुझे बच्चे की फीस के लिए तीस हजार रुपये चाहिए जो कि आपका पुराना छात्र है, यदि फीस समय से नहीं भरी तो वह परीक्षा से वंचित कर दिया जाएगा।”
” मैंने कहा कब तक भरनी है
“उसने कहा कल आखिरी तारीख है
मैं आपका पूरा पैसा अगले माह वापिस कर दूंगा।” चूंकि बात छात्र की “फीस और परीक्षा” की थी अतः मैंने पैसे दे दिये। हालांकि सब ने मुझे टोका की अब वापिस कैसे मिलेंगे? आपने क्यों दिये? मेरे सभी शुभचिंतकों ने मुझे टोका, मेरे विद्यालय की ही “एकाउटेण्ट” मुझे से बोली, कि “मैडम आप इस तरह भरोसा करके किसी की भी मदद करेंगी तो हो सकता है आपके पैसे वापिस ना आए। आजकल भलाई का जमाना नहीं है ।”
मैं मुस्कुराकर चुप हो गई लेकिन मन में एक भरोसा था ।
एक माह बाद वेतन मिलने पर कन्हैया मेरे कक्ष में आया और पूरे पैसे वापिस दे गया। साथ ही एक-दो दिन देर से देने पर क्षमा भी मांग ली।
मुझे भरोसा तो था पर उस दिन मुझे बड़ी संतुष्टि हुई कि उसने मेरे भरोसे का मान रखा।

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