Sunday, September 25, 2022
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सामाजिक सरोकारों वाले साहित्यकार थे ‘अधीर’, स्मृति विशेष

वीरेंद्र त्रिपाठी, लखनऊ। बाबा राम आधार शुक्ला ‘अधीर’ अवधी के कवि व लेखक थे। ये ‘बाबा जी’ के नाम से प्रसिद्ध थे। समाज में इनकी पहचान एक सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता,राजनीतिज्ञ व कवि के रुप में थी।इनका जीवन सादगी भरा था तथा ये सादा जीवन उच्च विचारों के प्रति आजीवन समर्पित रहे। इन्होंने पटरंगा में एक इंटर कालेज -लाला राम कुमार इंटर कॉलेज की स्थापना साठ के दशक में किया और जीवन के अन्तिम क्षण तक उक्त कॉलेज के सर्वांगीण विकास में चिन्तनशील रहे। इन्होनें 1995 में शिव साहित्य परिषद नाम की एक साहित्यिक संस्था की स्थापना किया।जिसके माध्यम से निकलने वाली एक साहित्यिक पत्रिका का भी इन्होंने सफल सम्पादन किया।उक्त पत्रिका में साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचनाएं प्रकाशित होती थी जिसमें स्थानीय रचनाकारों के साथ देश के प्रसिद्द रचनाकारों की रचनाएं भी प्रकाशित होती थी।उप्र खासकर अवध क्षेत्र मे सन् अस्सी से मंचीय कवि के रूप में अपने को स्थापित किया था।शुरुआती दौर में इन्होंने वीर रस में कविताएं लिखी तथा बाद के वर्षों में तमाम रसों व विधाओं में अपनी रचनाएं देते हुए अपनी दृष्टि व अपने जीवन के अनुभव को जनमानस के सामने प्रस्तुत किया।इनके कई मुक्तक व छन्द बहुत प्रसिद्ध हुए जो आज भी प्रासंगिक है।

हिन्दी साहित्या को किया समृद्ध

हिन्दी साहित्य सेवा में इन्होंने विभिन्न विधाओं में अपनी लेखनी चलाई।इन्होंने गीत,गजल,छन्द,दोहे व मुक्तक लिखे तो वही इन्होंने तमाम समसमायिक, सामाजिक व साहित्यिक लेख भी लिखे है। इन्होंने तुलसीदास जी के जीवन संघर्ष पर एक शोधपरक व काव्यात्मकता से परिपूर्ण ग्रन्थ की रचना की तो वही पंचायत चालीसा,कन्या शीर्षक से एक स्त्री के जन्म से मृत्यु के जीवन वृत्त व उसके जीवन संघर्ष पर आधारित काव्य ग्रन्थ भी लिखा।लेकिन दुर्भाग्य से इनकी कोई पुस्तक प्रकाशित न हो सकी हांलाकि इनकी रचनाएं व लेख नियमित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे।इनकी मृत्यु के बाद इनकी तमाम रचनाओं की चोरी भी हुई तथा इनकी तमाम रचनाएं कहां है किसी को नही पता है।बाबा राम आधार शुक्लानिधन 25 जुलाई 2006 को अचानक 76 वर्ष की अवस्था में हृदयाघात से हो गया।

पढ़िएं चुनिंदा रचनाएं…

मुक्तक
(1)
पथ प्रदर्शक भी पाये लगे घात में,
घुट रहा दम सुधारस की बरसात में।
कैसे कह दूं, अमावस्या गुनहगार हैं,
काफिले लुट रहे चांदनी रात में।।
(2)
छू सके जो हृदय को वही गीत है,
कर सके मन पर शासन वही जीत है।
सुख दें,शान्ति दें और समय पर मिलें,
काम गाढ़े में आवें वही मीत है।।
(3)
परख मानुष की करना खिलौना नही,
बन के कातर दर-दर में रोना नहीं।
भ्रम में न पड़ो हर चमक देखकर,
हर चमकती हुई धातु सोना नहीं।।
(4)
कष्ट जिसने सहा क्या से क्या बन गया,
स्नेह जलने लगा तो,शमा बन गया।
जब तराशा गया,दर्द हंस कर सहा,
कल का पाषाण जो देवता बन गया।।

छन्द
(1)
गीता या कुरान या रामायन पुरान सभी,
कौन सा मुकाम जहां लड़ना सिखाया है।
कौन सद्ग्रन्थ कौन पंथ कहता है लड़ो,
जाने यह मानव कहां से भरमाया है।
शांति और सुख का संदेश सबही ने दिया,
खोजा है संजीवनी अमिय बरसाया है।
खून का है प्यासा क्यों मनुष्य का मनुष्य आज,
पग-पग देखो यह अधीर टकराया है।

(2)
अहैं भाग्य चरित्र में कौन बली,
नित लोग यही चरचा करते हैं।
कुछ भाग्य चरित्र हिं जेरे चढ़ें,
मझधार में नाच नचा करते हैं।
बहु व्यर्थ विवादन मा उलझें,
अन्वेषण में खरचा करते हैं।
सच है कि अधीर की लाठी है भाग्य,
चरित्र से भाग्य रचा करते हैं।।
(3)
तन के गुलाम कोऊ मन के गुलाम,
विषयन के गुलाम कोऊ धन के गुलाम है।
दरबार तथा कोई कार के गुलाम,
कोऊ असन बसन परिजन के गुलाम है।
सुरा के गुलाम कोऊ सुन्दरी के,
कोऊ है अधीर सुबरन के गुलाम है।
चाम के गुलाम ताम-झाम के गुलाम,
आज सत्ता के पुजारी जन-जन के गुलाम है।।
(4)
वह सीख है व्यर्थ जो मानव को,
शुचि मानवता सिखला न सके।
वह सीख है कौन प्रयोजन को,
हमें बन्धन मुक्त करा न सके।
वह कैसी है सीख जो कायरता
तजि सिंह सपूत बना न सके।
वह सीख है व्यर्थ जो व्याकुल
दीन अधीर को धीर बना न सके।।

(5)
वह ढोंगी है जो नृप नीति पढ़ें,
जग में सत्कीर्ति कमा न सके।
अटके भटके नर नारिन को,
शुचि जीवन मार्ग दिखा न सके।
वह राष्ट्र का नायक व्यर्थ है जो,
सेबरी के निवास को जा न सके।
सुग्रीव की आस मिटा न सके,
अरु बालि का दर्प मिटा न सके।।
(6)
वह कैसी उठान है उन्नति का,
मन में सद्भाव जगा न सके।
अरु दीन व हीन मली मन का,
सस्नेह गले से लगा न सके।
किस काम अहो वो दीप जले जलके,
तम अन्तर का जो भगा न सके।
घर के अपने भटके जन को
गहि बाह जो राह दिखा न सके।।

(7)
गुरु व्यर्थ है जो धन नाश करैं,
कर्त्तव्य का पाठ पढा न सके।
वह शिष्य भी क्या जो गुरु पद में
रहि ज्ञान की ज्योति जला न सके।
वह स्वामी व्यर्थ है जो अपुने,
अनुगामी का कष्ट मिटा न सके।
वह सेवक है किस काम अहो,
प्रभु सेवा में ध्यान लगा न सके।।
(8)
भारत के जन भारतीयता सनेही आओ,
जन-गण-मन में अमित प्यार भर दो।
भावना भरें औं चले हिल मिल के अधीर,
शत्रु थहराय ऐसी एकता लहर दो,
सोनवा चिरैया मड़राय विश्व आंगन में
शक्ति दो प्रखर तेज रफ्तार भर दो।
कोई न चलेगा तेरा तंत्र और मंत्र कही,
बाबरी के बाबर को होशियार कर दो।।
(9)

कन्या

शुचि गंगा व गीता समान पवित्र,
सुसीता के रुप में आती है कन्या,
ज्योति बिखेर चहुँ दिशि में
तम पुंज को मारि भगाती है कन्या,
पुनि राम व कृष्ण और गौतम,गांधी
से लाल धरा पर लुटाती है कन्या,
कुल दीपक मा वर स्नेह के संग
सदा जलती बनि बाती है कन्या।।
(10)
सुख देत कबौ जननी बनि कै,
भगिनी बनि श्रद्धा लुटावति कन्या।
थिरकै कबहूँ हिरनी बनि कै,
पितु,मातु की गोद सजावति कन्या।
रमणी बनि कै सुख देत कबौ,
रस की बरसा बरसावति कन्या।
धरनी बनि चोट सहै पिय की,
परिवार का स्वर्ग बनावति कन्या।।

गजल

हर शूल जिन्दगी का पलभर की खताही है।
अनुभव बता रहे है,इतिहास गवाही है।।
पंथी सम्हलकर चलना पग-पग पे कसाले है।
पलभर की चूक बनती सदियों की तबाही है।।
जिन्हें देवता पुकारा और दूध भी पिलाया है।
अवसर कभी न चूके ,जब पाया डसाही है।।
मैं ढूंढता हूं उसको कब से अधीर होकर।
पहचान न ही उसका न उसका पता ही है।।
अस्तित्व न ही उसका कब जाने फूट जाये।
आखिर यह खिलौना भी मिट्ठी का बना ही है।।

कविता

सप्तमाकाश पर मन मयूर जिस क्षण कल नर्तन करता है,
तब भाव भरे गुन-गुन कुछ गाने का मन करता है।
तब अहंकार गल जाता है,बाह्याडम्बर धुल जाते है,
अपने अनुभव और दृष्टिकोण मानस पर खुल जाते है।
वह युगदृष्टा त्रिकालदर्शी को ज्ञान लुटाती सविता है,
उस कवि की वाणी से जो प्रस्फुटित हो जाये वह कविता है।।

– बाबा राम अधार शुक्ल,अधीर
पूरे नन्दू मिश्र,जखौली पटरंगा फैजाबाद

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