Thursday, September 29, 2022
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मजदूरों और किसानों को मिलकर संयुक्त आंदोलन करना होगा: शिवाजी राय

लखनऊ। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों एवं स्वतंत्र फेडरेशनों के संयुक्त तत्वावधान में मजदूर बचाओ देश बचाओ अभियान के तहत लखनऊ स्थित श्रमायुक्त कार्यालय पर विशाल धरने का आयोजन किया गया तथा इसके पूर्व मजदूरों- कर्मचारियों ने चारबाग रेलव स्टेशन से पैदल मार्च भी किया।

इस अवसर पर इंटक, एटक, सीटू, यूटीयूसी एक्टू, एआईयूटीयूसी, एचएमएस, सेवा सहित अन्य स्वतंत्र फेडरेशन के कार्यकर्ता शामिल रहे। एआईयूटीयूसी के राज्य कार्यालय सचिव कामरेड वालेन्द्र कटियार ने सम्बोधित करते हुए कहा कि एक दौर था जब मजदूरों ने संघर्ष करते हुए सरकारों को मजदूर हितों के लिए कानून बनाने को बाध्य किया। और आज का दौर है जब सरकारों द्वारा कानून बनाए जा रहे हैं कि मजदूर न तो आंदोलन कर सकते हैं, न ही धरना दे सकते हैं और न ही किसी संगठन को आर्थिक मदद कर सकते हैं और न ही किसी आन्दोलन का समर्थन कर सकता है। यह दौर अब आ चुका है। मजदूरों को अपने संघर्ष के इतिहास से सबक लेकर जबरदस्त ताकतवर आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। यही वक्त का तकाजा है।

धरने को विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों चन्द्रशेखर, प्रेमनाथ राय, उमाशंकर, उदय सिंह सहित अन्य ने भी संबोधित किया। धरने को अपना समर्थन देने संयुक्त किसान मोर्चा के पदाधिकारी शिवाजी राय भी पहुंचे। उन्होंने मजदूरों व किसानों की एकता पर बल देते हुए कहा कि हमला चौतरफा है और वक्त का तकाजा है कि मजदूरों और किसानों को मिलकर संयुक्त आंदोलन विकसित करना होगा।

एडवोकेट वीरेंद्र त्रिपाठी ने अपनी बातचीत में बताया कि श्रम न्यायालयों में जजों के रिक्त पड़े पद श्रमिकों को न्याय मिलने में बाधा पैदा कर रहे है। उन्होंने बताया कि श्रम न्यायालय से न्याय प्राप्त करना मजदूरों के लिए बहुत कठिन है। इसके लिए जजों व कर्मचारियों की स्थायी भर्ती करना अत्यावश्यक है। इस अवसर जारी विज्ञप्ति में आल इंडिया वर्कस कौंसिल के अध्यक्ष ओपी सिन्हा ने कहा कि केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों एवं स्वायत्त फेडरेशनों की 9 अगस्त को श्रमिक बचाओ देश बचाओ आंदोलन की पहलकदमी सराहनीय है।

श्रमिक आंदोलन को अब राजनीतिक दृष्टि से संघर्ष के लिये आगे बढना है। उन्होंने कहा कि पहले के समय में श्रमिक संघर्षों के साथ समाजवाद समाज का मुद्दा जुड़ा रहता था, इससे लड़ाई व्यापक हो जाती थी और सफल होती थी। आज फिर इसी सोच को नये रुप में श्रमिक आंदोलन से जोड़ना होगा ताकि श्रमिक आंदोलन में पूंजीवादी राजनीति के विकल्प के रूप में सामने आये। यही सोच श्रमिक-किसान संघर्षों को एक करेगी और हम सफलता की ओर बढ़ेंगे।

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