लखनऊ। बीजेपी हाईकमान के एक दांव से यूपी बिहार में जातिवाद और पिछड़ा वर्ग पर राजनीति करने वाले यादव समाज के किसी भी बड़े नेता का बयान तक नहीं आया। अभी तक बीजेपी को पिछड़ा वर्ग खासकर यादव विरोधी करार कहकर कई दल राजनीति कर रहे थे। अब विधायक दल की बैठक में सबसे पीछे बैठने वाले मोहन यादव को सीएम बनाकर बीजेपी ने यह संदेश दिया कि बीजेपी का एक अदना सा कार्यकर्ता भी उच्चपद प्राप्त कर सकता है जबकि जाति वाद की राजनीति करने वाली पार्टियां केवल परिवार को बढ़ावा देती है। बता दें कि यूपी और बिहार के चुनाव को यादव वर्ग काफी प्रभावित करता है अब यादव वर्ग के मतदाताओं को अपनी तरफ करने के लिए पार्टी एक हथियार की तरह प्रयोग करेगी। बता दे कि पूरे देश में इस समय यादव समाज का कोई नेता सीएम के पद पर नहीं है।
चुप्पी साध गए जातिवाद के राजनेता
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मोहन यादव को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित करने के बाद सपा के प्रमुख नेताओं ने चुप्पी साध ली है। भाजपा के इस फैसले को यूपी, बिहार व हरियाणा में भी यादव मतदाताओं को लुभाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। न ही किसी नेता ने कोई प्रतिक्रिया दी। यूपी में 10-12 प्रतिशत आबादी यादवों की हैं, वहीं बिहार में इनकी संख्या 14.26 प्रतिशत और हरियाणा में 10 प्रतिशत के आसपास है। वर्ष 2001 में तत्कालीन सीएम राजनाथ सिंह के कार्यकाल में गठित हुकुम सिंह कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार यूपी में भी पिछड़ी जातियों में सबसे ज्यादा संख्या यादव जाति की है। बीजेपी ने हिन्दी पटटी में ऐसी राजनीति की,जिसका सपा के पास कोई तोड़ नहीं है। एक तो भाजपा पिछड़ा वर्ग के लोगों को लुभाया दूसरे परिवारवाद की राजनीति करने वालों का मुंह बंद कर दिया।
परिवारवाद की राजनीति करने वालों को झटका
यादव समाज के वोट पर अधिकार समाझने वाली यूपी, बिहार के दोनों प्रमुख दल परिवार वाद की पोषक है। इन पार्टियों पर परिवार के ही सदस्य का अधिकार है। ऐसे में बीजेपी के इस दांव से इन पार्टियों को मानों साप सूघ गया है। एक बार भी अपनी जाति के नेता के पक्ष में बयान नहीं दिया। बीजेपी ने यह संदेश दिया कि हमारा आखिरी कार्यकर्ता या विधायक उच्चपद के काबिल है जबकि दूसरी पार्टियों काबिल से काबिल व्यक्ति भी परिवार वाद के सामने बौनाा सामने नजर आता है, बात करें कांग्रेस, सपा या किसी अन्य की।
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