ग़ज़ल : नई भाषा.. नए शब्द गढ़ रहे हैं हम…

नई कविता नई भाषा नए शब्द गढ़ रहे हैं हम ।
जिन्दगी के फलसफे को मंद मंद पढ़ रहे हैं हम ।।

अपनी-अपनी लाश लेकर फिर रहे हैं रहगुजर में,
धीरे-धीरे उम्र के अंतिम सफ़र पर बढ़ रहे हैं हम ।

खौफ के साए में रहती है हमेशा जिन्दगानी,
चल रहा है काल पीछे और आगे चल रहे हैं हम।

चाँद सूरज जमीं आसमां तूफ़ान जंगल हर कहीं,
हो निडर वक्त के सीने पे हर पल चढ़ रहे हैं हम ।

अभी न आओ यहाँ,पास अभी वक्त नहीं है बिलकुल,
अभी तो नई तकनीक की तस्वीर मढ़ रहे हैं हम ।

शोख चंचल मदभरी ये आँखें न भूलने के लिए,
आपकी फोटो को दिल के फ्रेम में जड़ रहे हैं हम ।

सजा ए मौत मुकरर्र की गई है हमारे वास्ते,
इसलिए अब दवा दुआ से इनकार कर रहे हैं हम।
—राम नरेश उज्ज्वल

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