लखनऊ। UP Assembly Elections यूपी में विधानसभा चुनाव को भले ही अभी एक साल का समय है, लेकिन राजनीतिक दलों की नजर अभी से समाज को जातिगत राजनीति में बांटकर वोट हासिल करने को लेकर है। एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट जातिवाद के जहर को खत्म करने के लिए आदेश पर आदेश दिए जा रही है। वहीं विपक्षी दल हर उस जाति पर डोरे डालने के लिए चाल चल रही है,जो सरकार से असंतुष्ट हो रहे है। माघ मेले में उभरे शंकरार्य विवाद और यूजीसी के नए नियमों के आने के बाद सवर्ण समाज को अपने पाले में खींचने के लिए सपा, बसपा और कांग्रेस लगातार बयानबाजी कर रही है। अभी तक मुस्लिमों को रिझाने में जुटे राजनीतिक दलों को अब अचानक सवर्ण समाज से उम्मीदें दिखने लगी है।
बसपा को सबसे अधिक उम्मीद
यूपी की राजनीति पर नजर डाले तो पता चलता है कि अभी तक उसी को सत्ता मिली है, जिसे दलितों या मुस्लिमों का सहारा मिला हो या सवर्णों के साथ ओबीसी का वोट मिला हो। पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती ने मुस्लिमों पर भरोसा जताकर टिकट दिए थे। इसके बावजूद बसपा को मुस्लिमों के वोट नहीं मिले। तब मायावती ने बयान दिया था कि भविष्य में वह मुस्लिमों को सोच समझकर ही टिकट देंगी।
चूंकि सवर्ण चार बार उनको जीत का स्वाद चखा चुके हैं। इसलिए उन्होंने इस बार ब्राह्मणों को केंद्र में रखकर विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंका है। अभी हाल ही में विवादित वेब सीरीज घूसखोर पंडत पर मायावती ने ब्राह्मणों के पक्ष में खुलकर बात रखी और फिल्म की आलोचना की। ये भी कहा कि कुछ समय से यूपी ही नहीं बल्कि अब फिल्मों में भी पंडत को घूसखोर आदि बताकर अपमानित किया जा रहा है। यही नहीं उन्होंने सीरीज पर प्रतिबंध लगाने की भी मांग की। साफ है कि मायावती ब्राह्मण कार्ड के सहारे आगामी चुनाव में अपनी खोई हुई सियासत जमीन हासिल करना चाहती हैं।
ब्राह्मणों को साथ लाने की रणनीति
बसपा सुप्रीमो मायावती ने विधानसभा चुनाव-2027 के लिए एक बार फिर ब्राह्मण समाज को साथ लाने की रणनीति का संकेत दिया है। मायावती ने एक माह में तीसरी बार शनिवार को ब्राह्मणों के सम्मान और हितों की बात की। इससे पहले 15 जनवरी को उन्होंने प्रेसवार्ता कर कहा था कि ब्राह्मणों को बाटी चोखा नहीं सम्मान चाहिए। वहीं एक दिन पहले शुक्रवार को घूसखोर पंडत फिल्म को ब्राह्मणों का अपमान बताते हुए इस पर प्रतिबंध की बात की थी
यूजीसी बना सामाजिक तनाव का कारण
मायावती ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि एससी, एसटी व ओबीसी आरक्षण-विरोधी नीति की वजह से इन वर्गों के लिए सरकारी नौकरी पाने व प्रमोशन में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। गलत नीति की वजह से यूनिफॉर्म सिविल कोड को सामाजिक समरसता की बजाय सामाजिक तनाव का नया कारण बना दिया। केंद्र व राज्यों की भी अधिकांश सरकारें पिछले कुछ समय से जनहित के इन मुद्दों पर ध्यान देने की बजाय जाति व धर्म की आड़ में ही अपनी राजनीति चमकाने में लगी हैं। इससे समाज में नफरत की भावना पैदा हो रही है, जो देश व जनहित में सही नहीं है।
बसपा सुप्रीमो ने सरकार व विपक्ष के बीच राजनीति व टकराव की वजह से संसद के वर्तमान बजट सत्र के हंगामे की भेंट चढ़ने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस समय संसद सत्र चल रहा है, जिसमें सत्ता व विपक्ष देश व जनहित के मुद्दों पर चर्चा करने की बजाय एक-दूसरे को नीचा दिखाने का जो घटिया ड्रामा व खेला कर रहे हैं। पक्ष-विपक्ष को भारतीय संविधान की गरिमा ध्यान रखनी चाहिए। संसद को चलाने के लिए जो नियम-कानून बने हैं, उन पर अमल करना चाहिए।
सपा की नजर क्षत्रिय मतदाताओं
इसके साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश मुस्लिमों के साथ ही क्षत्रियों को साधने के लिए बड़े ही गुपचुप तरीके से काम कर रहे है। असंतुष्ट चेहरों के सहारे वह क्षत्रिय समाज को अपने पाले में करने के पक्ष में है। अभी हाल ही में यूजीसी के लिए चरखारी के विधायक द्वारा कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह के घेरने को लेकर अखिलेश यादव ने इसे क्षत्रिय समाज का आक्रोश जताते हुए सरकार पर जोरदार हमला बोला था।वहीं कांग्रेस भी मुस्लिमों के साथ ही एक बार फिर दलितों और ब्राहृमणों को अपने पक्ष में करने के लिए पुरजोर कोशिश में जुटी हुई है।
