Wednesday, October 5, 2022
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अग्निपथ स्कीम बची-खुची सरकारी नौकरियों को समाप्त करने की चाल है: AIDSO

लखनऊ। सेना भर्ती के नियमों में बदलाव कर केंद्र सरकार द्वारा लाई गई अग्निपथ स्कीम की आड़ में स्थाई नौकरियों को खत्म करने की सरकार की साजिश की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए एआईडीएसओ के महासचिव सौरव घोष ने बयान जारी करते हुए कहाः “देश भर में सेना के तीनों अंगों में भर्ती नियमों को बदलते हुए 4 साल की भर्ती कर सेवाएं खत्म करने का फैसला- अग्निवीर बनाना देश के युवाओं के साथ बहुत बड़ा धोखा है। आज जब चारों तरफ सरकार ने निजीकरण कर सरकारी नौकरियों को खत्म कर दिया है, अपने भविष्य की चिंता में लाखों छात्र दिन रात एक कर सेना भर्ती के लिए तैयारी करते हैं।

चार साल के बाद बेरोजगारी का डर

कई राज्यों में परीक्षाएं देकर नौजवान भर्ती का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन उन्हें रद्द कर दिया गया। कॉन्ट्रैक्ट के आधार 4 साल की अस्थाई नौकरी लाने के पीछे सरकार का मकसद हर तरीके से देश की जनता की जिम्मेदारी लेने से पल्ला झाड़ने की हीं एक कोशिश है। पहले ही कई अन्य सेवाओं में ठेकेदारीकरण की नीति से छात्र नौजवानों का भविष्य अनिश्चितता की स्थिति में है। अग्निपथ जैसे लुभावने नाम पर लाई गई यह स्कीम केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों की ही अगली कड़ी है। न सिर्फ सेना में बल्कि अन्य सभी क्षेत्रों में भी स्थाई भर्ती खत्म कर ठेकेदारीकरण, आउटसोर्सिंग, फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट जैसे कदम देश की नौजवान पीढ़ी के जीवन को पूरी तरह अनिश्चितता और अंधकार में धकेलने की नीतियां हैं। एआईडीएसओ इसकी कड़ी निन्दा करता है।

सेना के ठेकाकरण की शुरुआत

छात्रों-नौजवानों ने समझ लिया है कि अग्निपथ असल में निजीकरण और सेना के ठेकाकरण की शुरुआत है। इसीलिए जिन्हें अग्निवीर का तमगा लगाकर इस नीति के पक्ष में सरकार खड़ा कर रही थी वे हीं इस नीति के विरोध में पूरे देश में सड़कों पर उतर आये हैं।कई जगह पर आंदोलनकारी छात्र युवाओं पर पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया। एक स्वतःस्फूर्त आंदोलन देश भर में शुरू हो गया है। यही नही 24 घंटे के अंदर ही इसकी आयु सीमा को 21 से बढ़ाकर 23 करना पड़ा है। श्री सौरव घोष ने छात्र युवाओं से भी अपील की कि सरकार की इन जनविरोधी नीति के खिलाफ गहरी समझ के साथ एक दीर्घस्थाई और अनुशासित आंदोलन संगठित करें। इसके साथ ही छात्रों को शिक्षा-विरोधी, जन-विरोधी तमाम नीतियों के खिलाफ उठ खड़ा होना होगा, तभी यह आंदोलन अपनी परिणति पर पहुंच पाएंगा।

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