अधिवक्ताओं ने उप्र लोक तथा निजी संपत्ति क्षति वसूली अधिनियम 2020 को बताया संविधान और मूल अधिकारों का विरोधी

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Advocates told the UP Public and Private Property Damage Recovery Act 2020, opposed to the Constitution and Fundamental Rights
विचार गोष्ठी में बोलते हुए अधिवक्ता के. के. राय

प्रयागराज। अधिवक्ता मंच इलाहाबाद की ओर से गवर्नमेंट प्रेस के श्रमहितकारी केंद्र में “संविधान की कसौटी पर उत्तर प्रदेश लोक तथा निजी संपत्ति क्षति वसूली अधिनियम 2020” विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई। विचार गोष्ठी की अध्यक्षता अधिवक्ता राम कुमार गौतम ने किया। विषय प्रवर्तन करते हुए अधिवक्ता रमेश कुमार ने संविधान के अनुच्छेद 13 में निहित पृथकरणीयता और आच्छादन के सिद्धांत पर चर्चा करते हुए बताया कि विधान मंडल और संसद के द्वारा बनाये गए किसी कानून की सवैधानिकता को उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

कोई कानून यदि संविधान के अध्याय 3 में वर्णित नागरिकों के मूलाधिकारों को कमतर करता है तो वह कानून शून्य घोषित किया जाना चाहिए। उन्होंने उ0प्र0सम्पत्ति क्षति वसूली कानून के विभिन्न प्रावधानों को विस्तार से रखा। बतौर मुख्य वक्ता गोष्ठी को संबोधित करते हुए अधिवक्ता उच्च न्यायालय व पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष के0के0 राय ने बताया कि संसद और विधान मण्डल में बिना चर्चा किये ध्वनि मत से कानूनों को पारित किया जा रहा है जिसका परिणाम है कि एक एक कर ऐसे कानून पारित हो रहे हैं ।

जनविरोधी कानूनों को पारित किया

जनता की आकांक्षाओं के खिलाफ तो हैं ही संविधान में प्रदत्त नागरिकों के मूल अधिकारों को कमतर करते हैं और लोकतंत्र की मूल भावना को समाप्त करते हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में विधान परिषद में विपक्ष का बहुमत होने के बावजूद ध्वनिमत से वसूली अधिनियम 2020 सहित अन्य जनविरोधी कानूनों को पारित कर दिया गया। उन्होंने बताया कि उ0प्र0 लोक तथा निजी संपत्ति क्षति वसूली अधिनियम नागरिकता आन्दोलन के आंदोलनकारियों के खिलाफ बदले की भावना से लगाई गयी तश्वीरों पर उच्च न्यायालय के स्वतः संज्ञान लेकर तश्वीरें हटने के आदेश के बाद लाया गया किंतु ये कानून न केवल अल्पसंख्यकों के खिलाफ बल्कि किसी भी सवाल पर जनता की उठती आवाजों को दबाने के लिए लाया गया है।

मौलिक अधिकारों का उल्लघन करता है

इस कानून से जहां एक ओर अनुच्छेद 19 में प्रदत्त नागरिकों के अभिव्यक्ति के अधिकार को सीमित किया जा रहा है, वहीं किसी मामले में सक्षम न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि के बिना ही उसे दोषी मानकर उसकी सम्पत्ति को जब्त करने का प्रावधान अनुच्छेद 20 और 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लघन करता है। उन्होंने बताया कि इस अधिनियम के अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट के आधार पर कार्यवाही शुरू की जाएगी और रिटायर्ड जिला न्यायाधीश और कमिश्नर को मिलाकर गठित न्यायाधिकरण उस मामले में सुनवाई करके फैसला देगा।इस ट्रिब्यूनल के आदेश को किसी अदालत में चुनौती नही दी जा सकेगी इस प्रकार यह देश की स्थापित न्यायव्यवस्था तक जनता की पहुंच के दरवाजे बंद करता है। यह अधिनियम 2009 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किये गए दिशानिर्देशों की भी खुले तौर अनदेखी करता है।

विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ अधिवक्ता और PUCL के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री रविकिरण जैन ने बताया कि मूल अधिकारों को कमतर करके जनता के ऊपर थोपे जानेवाले जनविरोधी काले कानूनों रासुका, uapa, गुंडा एक्ट, गैंगस्टर एक्ट, टाडा, पोटा आदि ऐसे ही क़ानून हैं जो हमारे लोकतंत्र को कमजोर करने वाले हैं और पिछले 30-40 वर्षों में ऐसे कानूनों की लंबी लिस्ट बन गयी है जो जनविरोधी हैं और मूल अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। उन्होंने गहरा दुख जताते हुए कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करने का काम न्यायपालिका का है किंतु जनविरोधी कानूनों की संवैधानिकता की समीक्षा करने में अदालते बुरी तरह विफल रही हैं,जिसके लिए न्यायाधीशों का सरकारोन्मुखी रुझान और पोस्ट रिटाइरल नियुक्तियों की लालच जिम्मेदार हैं।

त्वरित सुनवाई की मांग

कानूनों की संवैधानिकता को चुनैती देनेवाले मामलों को प्राथमिकता में सुने जाने की जरूरत बताया। उन्होंने इस बात पर भी असंतोष जताया कि अदालत में ऐसे मुकदमों पर त्वरित सुनवाई की जहग ठंढे बस्ते पर डाल कर हतोत्साहित किया जा रहा है। सभा को संबोधित करते हुए हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष जमील अहमद आज़मी ने कहा कि संपत्ति वसूली कानून एक तरह से मुख्यमंत्री योगी का गुंडा एक्ट है जो अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के उद्देश्य से लाया गया है किंतु इसका इस्तेमाल जनता की आवाज को कुचलने के लिए किया जाएगा जिसमे सभी आयेंगे, इसलिए ये कानून देश के संविधान और जनता के खिलाफ है।

गैंगस्टर एक्ट में झूठा फंसाया

सह- संयोजक मो. सईद सिद्दीकी के मऊ जिले में नागरिकता आंदोलन को कुचलने के लिए हजारों लोगों के शांतिपूर्ण विरोध पर पांच एफआईआर किया गया और उनसब मामलों में अग्रिम जमानत हो जाने के बाद गैंगस्टर एक्ट में झूठा फंसाया गया और इस पर हाईकोर्ट से अरेस्ट स्टे करा देने पर गुंडा एक्ट के अंतर्गत फसाया गया उस पर भी अधिवक्ता मंच ने हाई कोर्ट से स्टे करा दिया तो कुछ लोगों पर एनएसए लगाकर जेल में डाल दिया गया और ऊपर से 26 लोगों के विरुद्ध 49 लाख 90 हजार रुपये की वसूली के आदेश पारित कर दिया वो भी बिना सुनवाई का मौका दिए और बिना घटना में शामिल होने का कोई सबूत दिए।

सभा को सीमा आज़ाद, धर्मेंद्र सिंह, अवधेश राय, माता प्रसाद पाल, शमीमुद्दीन खान ने भी संबोधित किया। अपने अध्यक्षीय संबोधन में अधिवक्ता राम कुमार गौतम ने कहा कि अब अदालतों से नही जनता ही देश और संविधान को बचाने लड़ाई लडेगी। उन्होने कहा कि दस महीनों से जारी किसान आंदोलन एक उम्मीद है। अधिवक्ता मंच को इस प्रकार के परिचर्चाओं को और व्यापक तैयारी के साथ करना होगा और ऐसे कानूनों को अदालत में भी चुनौती देना होगा और जनता के बीच इनकी सच्चाई को ले जाना होगा।

गोष्ठी का संचालन राजवेन्द्र सिंह ने किया

गोष्ठी का संचालन अधिवक्ता मंच के संयोजक राजवेन्द्र सिंह ने किया। इस दौरान प्रमोद कुमार गुप्ता, राजीव कुमार, नीतेश कुमार यादव, घनश्याम मौर्य, मो0 इमरान, इरशाद अहमद अंसारी (पूर्वउपाध्यक्ष जिला अधिवक्ता संघ इलाहाबाद) काशान सिद्दीक़ी, सरताज़ सिद्दीकी, आकिब अख्तर खान, राजेश पटेल, सलमान, दयाशंकर प्रजापति, मुश्ताक़ अहमद, संजय प्रजापति, विकास मौर्य, त्रिभुवन सिंह, सारा अहमद सिद्दीक़ी, सुमित श्रीवास्तव, दरबारी लाल, रज्जन सिंह यादव, अभय सिंह, मुख्तार अहमद, प्यारे मोहन, कपिल यादव, विनोद कुमार, अरीब खान, प्रबल प्रताप, चार्ली प्रकाश, रितिका मौर्य, ओम प्रकाश राठी, राजकुमार, रमेश यादव, हरिओम गुप्ता, हीरालाल, कमलेश रतन यादव, विश्वविजय, इंद्रदेव यादव, आदि सैकड़ों अधिवक्ताओं सहित गवर्नमेंट प्रेस मिनिस्टीरियल एसोसिएशन के अध्यक्ष राम सुमेर व ए. एन. सिंह, संजय सिंह उपस्थित रहे।

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