Sunday, September 25, 2022
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पुस्तक समीक्षा: सियासत के दोहरे चरित्र का निरूपण है ‘वाया फुरसतगंज’

लखनऊ। दरअसल ‘वाया फ़ुरसंतगंज’ आज़ाद देश में विकसित हो रहे राजनीतिक चरित्र के दोगलेपन की कथा है। इसका यह दोगलापन सर्वव्यापी है और कदाचित इसका असर भी..!इसीलिये इसका प्रसार जीवन के सभी क्षेत्रों में होता दिखाई देता है। इसने हमारे आसपास के रोज़मर्रा के वातावरण को इस कदर आच्छादित कर लिया है कि इसके बिना जीवन की किसी एक गतिविधि का संचालन संभव नहीं..! क्या धर्म, क्या समाज, क्या प्रशासन, क्या पुलिस और क्या न्यायपालिका। एक—एक कर सभी इस बदलाव के अभ्यस्त हो चुके हैं। दुर्भाग्य यह कि हम स्वयं इस बदलाव पर आह्लादित होते चलते हैं!राजनीति को तो निठल्लेपन, डकैती, लूट, मक्कारी, झूठ और निर्वस्त्रता का रोग लग गया है। वह इसे सार्वभौम बना देना चाहती है। वह इस कोशिश में है कि उसके साथ बारी-बारी सब-के-सब निर्वस्त्र होते चलें। हम भी कहीं-न-कहीं उसके इस अभियान में उसके साथ खड़े दिखाई देते हैं।

ऐसे में ‘वाया फुरसतगंज’ आधुनिक राजनीति और समाज का वह आइना बनकर हमारे सामने आता है, जहाँ हम अपने चेहरे के विद्रूप को ठीक करने और उस पर लगी कालिख़ को साफ़ करने के बजाय आईने को साफ़ करने की कोशिशों में लगे दिखाई पड़ते हैं। हमारे लिए हर घटना केवल मनोरंजन-मात्र है और इसके अतिरिक्त यदि वह कुछ और है तो केवल एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल और आपसी षड्यंत्र का मैदान भर! राजनीति का मक़सद केवल सत्ता हासिल करना रह गया है और आश्चर्य यह कि भोली एवं बेवकूफ जनता उसके साथ इस खेल में शामिल होकर,बेतहाशा नर्तन करते हुए आत्मविभोर दिखाई पड़ती है। उसका यह बेतुका आत्मसमर्पण न केवल फुरसतगंज बल्कि पूरे देश के निवासियों के रग़ों में बहने वाले तरल की नियति बनकर रह गया है।

कथासार

दरअसल’वाया फुरसतगंज’ इलाहाबाद के एक ऐसे गांव की कहानी है जिसके निवासी जीविकोपार्जन वाले पारंपरिक रोजगार को छोड़कर अन्य सारे तरह के रोज़गार से वाकिफ हैं। एक दिन फुरसतगंज के हलकान मियाँ का इकलौता और बेरोज़गार पुत्र परेशान अली रात के अंधेरे में,पास के ही कुएं में गिर जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। सुबह पता चलता है कि उसके साथ उसकी इकलौती बकरी भी गिर कर मर गई। तमाम चैनलों पर खबर पसरने लगती है और मुख्यमंत्री बच्चा तिवारी के हौंकने के बाद ज़िले के नवनियुक्त कलेक्टर ज़बर सिंह गांव का दौरा करने निकल पड़ते हैं। फिलहाल शुरुआती जांच में इसे दुर्घटना का मामला बताकर रिपोर्ट शासन को भेज दी जाती है।

लेकिन ज्यों ही दारागंज के ‘नगरवधू अखाड़े की महामंडलेश्वर’ छम्मो देवी द्वारा परेशान की शहादत स्थल पर शहीद स्मारक बनवाने की घोषणा की जाती है। सुन्न पड़े स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व में अभूतपूर्व हरकत दिखाई देने लगती है। देखते-ही-देखते परेशान अली के बहुतेरे हमदर्द निकल आते हैं। कोई परेशान को मज़दूर बताने लगता है, कोई किसान, कोई अभिनेता तो कोई राजनीतिक कार्यकर्ता!धीरे-धीरे परेशान अली अपनी मौत के बावज़ूद सत्ता के गले की फाँस बनता जाता है और कभी उसकी मौत को सामान्य मौत बताने वाली सत्ता, अपने खुद के बनाये जाल में इस क़दर फँसती है कि उसे परेशान की कब्र खुदवाकर दोबारा जांच की संस्तुति करनी पड़ती है। इस जांच में सरकार के प्रखर विरोधी और मुख्यमंत्री के लिए निरंतर संकट बनकर उभर रहे विधायक पाखंडी शर्मा,परेशान को आत्महत्या के उकसाने के षड़यंत्र में अपने साथियों के साथ धर लिए जाते हैं।

फिर तो एकबारगी दोबारा मुख्यमंत्री बनने का सपना लेकर जी रहे बच्चा तिवारी की बाँछें खिल जाती हैं। लेकिन बच्चा तिवारी के रास्ते इतने आसान भी नहीं हैं। क्योंकि ठीक इसी समय झूँसी राजघराने के अंतिम अवशेष के रूप में मसान घाट में बतौर सन्यासी धूनी रमा रहे बाबू जोखन सिंह मौका देखकर अपना पासा फेंकते हैं और जेल से ही उसी विधानसभा क्षेत्र से पाखंडी का परचा भरवा दिया जाता है जहाँ से इस बार बच्चा तिवारी पहली बार उम्मीदवार हैं।बाबू साहब के इस प्रहार से बचने के लिए बच्चा तिवारी की पार्टी पाखंडी के खिलाफ मृतक परेशान अली के पिता हलकान मियाँ को मैदान में उतारती है,ताकि पाखंडी और हलकान-दोनों आपस में एक-दूसरे के वोट बाँट लें और बच्चा तिवारी की विजय का रास्ता सुगम हो सके। लेकिन मुश्किल तब खड़ी होती है जब एकाएक छम्मो देवी भी चुनाव के इस मैदान में कूद पड़ती हैं।देखते-ही-देखते चुनाव का सारा गणित फेल होने लगता है और जो बच्चा तिवारी तीसरी बार मुख्यमंत्री होने का सपना संजोये बैठे थे,उनकी हार आसन्न दिखाई देने लगती है।

विधि का विधान देखिए..! लाख अवरोधों के बावजूद छम्मो देवी न केवल विधायकी का चुनाव जीतती हैं बल्कि वे बच्चा तिवारी के रहते हुए,संयुक्त गठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद की दौड़ में भी सबसे आगे निकल जाती हैं। बच्चा तिवारी का लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का सपना ध्वस्त होने लगता है।तब छम्मो देवी के खिलाफ पल-पल नई चलें चली जाती हैं,अंदरखाने में नए-नए समझौते होने लगते हैं।लेकिन धूर्त राजनीति इतने भर से कहाँ सब्र करती है भला..!जिस स्त्री की चीर पूर्व में ही सैकड़ों बार खींची जा चुकी थी, उसे सभी मिलकर एक बार सरेआम निर्वस्त्र करना चाहते हैं.दुःखद यह कि इस कोशिश में पूरी-की पूरी राजनीति स्वयं निर्वस्त्र होने लगती है।

उपन्यासकार शायद यह दिखाना चाहता है कि फुरसतगंज में घटने वाली एक छोटी-सी घटना कैसे सभी के कौतुक का विषय बनकर उभरती है और कैसे सभी चाहे-अनचाहे इसमें एक-एक कर शामिल होते जाते हैं।फिर यह भी कि यह आरंभिक कौतूहल कैसे शासन-प्रशासन के लिए चिंता का सबब बनता जाता है और कैसे न चाहते हुए भी सभी इस घटना के इर्द-गिर्द बुने अपने ही जाले में उलझते चले जाते हैं।इस जाल में उलझने के बाद सत्ता पाने के लिए आपस की होड़,इसकी जद्दोजहद और फिर गलाकाट-संघर्ष को पाठक के सामने ले आना ही इस कथानक का मूल मंतव्य है।

पुस्तक समीक्षा:वाया फुरसतगंज (उपन्यास)
लेखक: बालेंदु द्विवेदी
प्रकाशन:वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली

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